#Kavita by Dr Avnish Singh Chauhan

1. देह बनी रोटी का ज़रिया
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​वक़्त बना जब उसका छलिया
देह बनी रोटी का ज़रिया

ठोंक-बजाकर देखा आखिर
जमा न कोई भी बंदा
‘पेटइ’ ख़ातिर सिर्फ बचा था
न्यूड मॉडलिंग का धंधा

व्यंग्य जगत का झेल करीना
पाल रही है अपनी बिटिया

चलने को चलना पड़ता है
तनहा चला नहीं जाता
एक अकेले पहिए को तो
गाड़ी कहा नहीं जाता

जब-जब नारी सरपट दौड़ी
बीच राह में टूटी बिछिया

मूढ़-तुला पर तुल जाते जब
अर्पण और समर्पण भी
विकट परिस्थिति में होता है
तभी आधुनिक जीवन भी

तट पर नाविक मुकर गया है
उफन-उफन कर बहती नदिया।
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​2. पीते-पीते आज करीना
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पीते-पीते आज करीना
बात पते की बोल गयी

यह तो सच है शब्द हमारे
होते ​हैं घर अवदानी
​घर जैसे कलरव बगिया में
मीठा नदिया का पानी

मृदु भाषा में एक अजनबी
का वह जिगर टटोल गयी

प्यार-व्यार ​तो एक दिखावा
होटल के इस कमरे में
नज़र बचाकर मिलने में भी
​मिलना कैद कैमरे में

​पलटी जब भी हवा निगोड़ी
बन्द डायरी खोल गयी

​बिन मकसद के प्रेम-जिन्दगी
कितनी​ है झूठी​-​सच्ची
आकर्षण में छुपा विकर्षण
बता रही अमिया कच्ची

​जीवन की शुरुआत वासना?​
​समझो माहुर घोल गयी​।

– डॉ अवनीश सिंह चौहान

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