#Kavita By Dr Daksh B Pataya

आज आहत है हृदय और अश्रु धारा बह रही है||
मन की पिड़ा वेदना की करुन कहानी कह रही है||

तड़प रहा है आज हिमालय सागर भी शर्मिंदा है|
सँविधान भी सोच रहा अब मरा पड़ा है या जिंदा है|
अमर शहादत मुस्करा कर विर गाँथा कह रही है||
आज आहत है हृदय और अश्रु धारा बह रही है||

बुझा है दिपक जिन घरो का उन पिता की क्या दशा है|
देख बेटे की अर्थि सोचो कैसे व्युव मे ओजा फसा है|
हर तरफ है घना अधेरा मौन बुढ़ी आखे कह रही है|
आज आहत है हृदय और अश्रु धारा बह रही है||

आज विधाता भी रोया होगा ईस विधी के लेख पर|
जो सुहाग की बेदी त्यागे लेटे है अग्नी सेज पर|
उन चिता से उठती लपटे जय भारती-3 ही कह रही है||
आज आहत है हृदय और अश्रु धारा बह रही है||
दक्ष बी. पटैया
बैतुल म.प्र
9179455171

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