#Kavita by Dr. Kavi Krishan Kant Dubey

सपनों की बुनियाद

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सूखी रोटी

और

सूखी मिर्च के आगे

ढह जाती है

सपनों की बुनियाद.

 

पेट और पीठ

जब दोनों चिपक

एक हो जाते हैं

तब कहाँ गुंजाईश रहती है

साँसें चलने की

धीरे-धीरे साँसों का सिलसिला थम सा जाता है

उन्हीं के साथ

सपनों की बुनियाद भी

जो रेगिस्तान के रेत से बनी है

धीरे-धीरे नदी के बाहव में बहने लगती है.

 

व्यवस्थाओं के टूटे टुकड़ों से बनी

सपनों की बुनियाद

समय की विपरीत लहरों से आहत हो

बिखर जाती है

और

उस बिखराव में बिखर जाती है आम जिंदगी

फिर भला वह कहाँ खड़ा हो पाता है-

व्यवस्थाओं के टूटे टुकड़ों के बीच

फिर भला वह कहाँ टिक पाता है-

प्रतिकूल हवा के थपेड़ों के साथ

बहुत कच्ची होती है

सपनों की बुनियाद.

 

सब जानते हैं

पर मानते नहीं हैं

कि

सपनों की सुनहरी दुनिया

सिर्फ सपनों में ही होती है

यथार्थ के धरातल पर उतरते ही

वह उड़न-छू हो जाती है

और एक बार फिर

सब कुछ ना पा सकने के दुख में डूबो जाती है

आँसूओं के सैलाव में बाह ले जाती है

दुखों के अपार अँधेरों से ढंकी है

सपनों की बुनियाद.

 

फूस के जर्जर घरौदों में

टूटी चारपाई

उस पर बिछी फटी गुदरी

बगल में रखीं

लाल मिर्च की चटनी के साथ सूखी रोटियाँ

पानी से भरा रखा लोटा

जिसमें बाहत्तर छेद धीरे-धीरे कर रहे अपना काम

इन सबके बीच

भला कैसे कोई बनाये

सपनों की बुनियाद

लेकिन फिर भी

कुछ लोग बनाने में लगे हैं

सपनों की बुनियाद.

*    *

डॉ(कवि)कृष्ण कान्त दुबे

कन्नौज

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