#Kavita by Dr. Kavi Krishan Kant Dubey

घास के तिनके

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कुछ घास के तिनके

ऐसे भी होते हैं

जिनपर झूलतीं हैं ओस बूँदें

और उन बूँदों को चाटकर

तमाम जीव अपनी प्यास बुझाते हैं.

 

सत्य तो ये भी है

कि इन्हीं घास के तिनकों को खाकर

हमारी गाय बाल्टी भरकर दूध देती है

और गाय की बछिया

इन्हीं तिनकों से सिखती है जुगाली करना

जान लेती है

घास का स्वाद.

 

बहुत उपयोगी हैं घास के तिनके

अगर बिछौना ना हो

तो फिर इनको बना लो बिछौना/और

तमाम रातों को चैन से बिता लो

कहाँ देते हैं चुभन

वो तो हर वक्त बनते हैं-

प्यास बुझाने वाली नदी

भूख मिटाने वाले   रोटी

और जरुत पड़ने पर बनते हैं

हारे,थके आदमी का मखमली बिछौना

घास के तिनके.

 

छतों के मुडेरों पर

खेत की मेड़ों पर

बागों की घनी छाँव तले

गाँव के हर खलियानों में

बल्कि

शहरों के छोटे-बड़े पार्कों

के शानदान मैदानों में

खूब लहलाहते हैं

घास के तिनके.

 

इतिहास साक्षी है

कि अनगिनत मोहब्बत के राज

घास के तिनकों पर ही बैठ कर खुले हैं

बँध गयीं जो रिश्तों की गाँठें

वह भी इन्हीं पर बैठ कर खुली हैं

मोहब्बत के तरानों की तान

रिश्तों की शान

और जिंदगी के उलझे पहलू

सब बनते हैं/सुलझते हैं

बड़े जानदार/शानदार हैं

घास के तिनके.

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