#Kavita by Dr. Krishan Kant Dubey

“हाथ जोड़ने के शिवा और भला

कर भी क्या सकता हूँ”

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मैं एक लाचार

और

असाहय व्यक्ति

हाथ जोड़ने के शिवा

और भला कर भी क्या सकता.

 

वही करता हूँ प्रतिदिन

नित्य क्रियाओं की तरह

तुम्हारे निवास की ओर मुख करके

खड़ा हो जाता हूँ/हाथ जोड़कर

और घंटों बुदबुदाता रहता हूँ

तुम्हारे मंत्र

शायद कभी सुन लो

मेरी याचनाओं से लिपटे शब्द

और कर दो कोई चमत्कार

बदल जायें मेरी जिंदगी की व्यवस्थाएँ.

 

हाथ जोड़कर

गाता हूँ प्रतिदिन

तुम्हारी ही प्रार्थनाएँ,

बस एक ही आशा

एक ही अभिलाषा

कि कभी तो सुनोगें

मेरी भी आवाज/और

कर दोगें मेरी पूरी कामना.

 

हे प्रभो!

प्रार्थनाएँ करना मेरा काम है

सो दिन-प्रतिदिन करता रहूँगा

प्रार्थनाएँ स्वीकारना तुम्हारा काम है,

मैं आत्मविश्वास से पगा

गाता जा रहा हूँ

तुम्हारे मंत्र

और

तुम्हारी प्रार्थनाएँ

और भला कर भी क्या सकता हूँ.

 

शायद कभी सुनाई पड़े मेरे स्वर

शायद कभी दिखाई पड़े मेरे बदहाल

और बक्श दो अपना अनुग्रह

हो जाऊँ गदगद

इसी उमींद को लिए

हाथ जोड़कर-

सुबह-सुबह खड़ा हो जाता हूँ

और गाने लगता हूँ अविरल स्वर में

तुम्हारे मंत्र

तुम्हारे गीत

*     *

डॉ.कृष्ण कान्त दुबे ‘संगम’

कन्नौज

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