#Kavita by Dr Naresh Sagar

शब्द सम्राट को श्रृंद्धाजलि

रो रहीं हैं गीत – गजल
सिसक रहे छंद है ।
शब्द सिसकिंया भरे ,
कागज भी बे – गंध है ।
मंच सुना – सुना पडा,
दिल बडा दर्द मंद है ।
तेरे बाद भी गीतों के राजा,
अमर कलम सुगंध है ।
आँख रोती , दिल तडपता,
जुवां भी जैसे बंद है !
ओ जादूगर शब्दों के ,
रो रहे गीत – छंद है !!

डाँ. नरेश कुमार “सागर”
आगमन साहित्य संस्था – गीतों के राजकुमार को देती है अपनी भावभीनी श्रृद्धांजलि

 

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