#Kavita by Dr Prakhar Dixit

एक कन्नौजी लोकगीत निवेदित

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नंदन वन मैंय रास रच्यो जब,

मुरली श्याम बजायी है।

भोला बनि गये नार छबीली,

गौरा बृज लैं आयी हैं।।

 

पहर घांघरों घूम घूमारो ओढी चटक चुनरिया।

करि सोलहु सिंगार चले ,जस- बृज की नवल बहुरिया।।

लम्बो घूँघट काढो शम्भु नै,

गौरा हिय हरषायी हैं।।

भोला बनि गये नार छबीली…………..

 

बिछुआ झनकै कंगना खनकै ठुमका दे रै हाँ री!

गौर नार बृज रुचि रुचि नाचैं घूमत दै दै तारी।।

कातिक पूनौ खिली जुन्हैया,

सुघर छवि कुंजन छायी है।।

भोला बनि गये नार छबीली…….

 

नाचत उघरो रूप ,सखिन नै- लौना खूब लगाए।

विश्वेश्वर रमि गये भूमि बृज गोपेश्वर नाथ कहाए।

हरि हर युति कौं प्रखर नाय सिर ,

वेद श्रुति कीरति गायी है।।

भोला बनि गये नार छबीली……….

 

नंदन वन मैंय रास रच्यो जब,

मुरली श्याम बजायी है।

भोला बनि गये नार छबीली,

गौरा बृज लैं आयी हैं।।

 

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प्रखर दीक्षित

फर्रूखाबाद

 

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