#Kavita by Dr Prakhar Dixit

छंद-पंचचामर

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प्रथमं शैलपुत्रिश्च

 

प्रथम रूप स्वर्ण आभ,

नमस्तुते गिरिसुता।

स्थापना कुंभ की,

जयति अंब जग हिता।।

 

तपोनिष्ठ वत्सला

ममत्व संग शक्तिदा।

बृषभरूढ अघ हरो,

ददाति वर शुभप्रदा।।

 

प्रदीप्त दीप ज्योतिका,

अष्ट याम आहुती।

मेटिए कलेश देवि,

उतारूँ माते आरती।।

 

धूम्रलोहित नयन

शुभांगी कांति दिव्यता।

हे महेश्वरी शैलजा,

मातृ रूप संस्थिता।।

 

कराल काल नाशिनी,

नम: भवानी अम्बिका।

चरण शरण प्रखर माँ,

सुत तेरो जगदम्बिका।।

 

प्रखर दीक्षित – फर्रूखाबाद

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