#Kavita by Dr Prakhar Dixit

पनघट सूना सूना

 

आत्मश्लाघा से

परिपूरित

दम्भ द्वेष के सौदागर

प्लावन मानिद

संज्ञाओं की

होती कोई

आन नहीं।।

 

जिसके हिस्से में

गुम्बद हों

अहंकार का

चढ़ा लबादा

सत्य वचन यह

,मीत मानिए

उनको

मर्यादा का

भान नहीं।।

 

अधजल गगरी

छलक रही थी

पनघट

सूना सूना था

भीग सका न

अन्तरमन सच

थोथी प्रज्ञा

बोधगम्य हिय

ज्ञान नहीं।।

 

प्रखर दीक्षित – फर्रुखाबाद

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