#Kavita by Dr Prakhar Dixit

आत्मनिवेदन

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हे दीनदयाल दयानिधि प्रभु भवतारक नाथ कृपा करिए।

हे गुणातीत राजीवनयन त्रय ताप विषम अघ आ हरिए।।

हे चतुर्भुजा वत्सल श्रीहरि बैकुंठनाथ मैं शरणागत हौं,

हे रमा पति करुणासागर अनुरक्ति भक्ति घट प्रभु भरिए।।

 

श्री विष्णु हरी शेषासायी मतिमूढ हों ज्ञान विवेक कहाँ।

हे ग़रीब निवाज हरहु विपदा तजि द्वार तुम्हार मैं जाऊँ कहाँ।।

मायापति माया को संकट हर लेहु जा माया दुखी करै,

तुम बिन को नाथ उबारै हमें हिय छांडि प्रभू जी ठौर कहाँ।।

 

गणिका गज गीध अजामिल कौं अनुकम्पा करी भव तार दिए।

संतन के कष्ट निवारन कौं धरनी पै प्रभु अवतार लिए।।

असुरारी असुर हने तद जब अघभार मही तल अधिक बढो,

श्रीपति आरत कर जोरि विनत उजास करौ प्रभु मेरे हिए।।

 

प्रखर दीक्षित

फर्रुखाबाद

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