#Kavita by Dr Prakhar Dixit

कन्नौजी रसरंग

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वियोग वेदना

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कुंजन बीथिन खोजतीं बिरहन बृज की नार।

बिनु कृष्ना उर ताप बढ़ का सुध दई बिसार।।

जो सांसें जो प्रान हिय सो गये बाँह छुडाय,

सावन भादौं नैन मँह बरसत जलद अपार।।

 

सूनो पनघट श्याम बिनु सूनी सुख की सार।

सूनी खरिक  घर दोहनी सूनो आँगन द्वार।।

धेनु मंझारन शून्यता मुरली के सुर सून,

सूनी आंखिन भोर नित हिवडे सूनो प्यार।।

 

तपै देह ज्यों जेठ ह्वैं  डारै विरह पजार।

बिखरी अलकैं शुष्क दृग नाहिं रहे रतनार।।

बेसुध भई निंदियी उड़ी कान्ह बिना बेहाल,

काह कहौं हिय की सखी दग्ध हिया दुख भार।।

 

वदा करे आए नहीं मानो जीवन भार।

ऊधौ सों पाती मिली सखी भयीं बेजार।।

तुम हो तौ रस रास रंग न तौ काल को ग्रास ,

छलो हमहिं छलिया प्रखर जो जग को आधार।।

 

राग नाहिं रस रंग कँह कहाँ बेनु की तान।

किन्हें उराहनो देंय सखि गयी अधर मुसकान।

कब अहियैं बृजराज जू भेटिंहैं बाँह पसार,

चित्तचोर घनश्याम जू आय करो उपकार।।

 

रचना= प्रखर दीक्षित

फर्रुखाबाद (उ.प्र.)

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