#Kavita by Dr Prakhar Dixit

पद

 

शारदे वंदना

 

मोय लीजो सरन  शारदे मैया।

श्वेत पदम पै आसन माते भूषन छंद सवैया।

वीणपाणि कर माला पुस्तक रखियो आंचर छैंयाँ।।

वाङ्ग्यमयी वपु हंसासनि शुभ तुमसैं राग गवैया।

ज्ञानदायिनी वर्ण समाहित आतम बोध करैया।।

लेखनि गिरा तुमहिं ब्रह्माणी  तुम भवतारिणि नैया।

प्रखर विवेक ज्ञान देहु शारद तुमहिं राह बनैया।।

**

एक प्रयास

 

यह शाम सुहानी मस्त मगर

तितली सा इठलाना ठीक नहीं।

यह बज्म तुम्हारे नाम मगर

चिलमन सरकाना ठीक नहीं।।

चिर लब की प्यास है थिरक मगर

यह शहर ए अदब जी रश्कों का,

माना कि काजल मेरा मगर

ये ज़ुल्मी जमाना ठीक नहीं।।

 

================

 

प्रखर

Leave a Reply

Your email address will not be published.