#Kavita by Dr Prakhar Dixit

आशा

व्याधियों के झंझावात

चिंताओं दुर्धस प्रपात

 

अकिंचन सा जीवन

ज्यों मधुकरी का पर्याय

तृण तृण बिखरे उजडे-

जीवन का सारांश

 

बस यही–

जो जितना सहज सुलभ

आधे अधूरे पेट

भरने की जुगाड जुगत में

ऐडी चोटी एक करता पुरुषार्थ–

एकटक ठंडे चूल्हे को

नीरवता में निहारती

बेबस मजबूर दृष्टि

जीवन से लगाए है

आशा जीने की।

 

क्या यही जीवन का

शाश्वत सत्य

प्रखर दीक्षित  – फर्रूखाबाद

 

 

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