#Kavita by Dr Prakhar Dixit

अब नयी अल्हाद की बारात आनी चाहिए।

बीती दुख की तम निशा  सुप्रभात आनी चाहिए।।

 

द्वंद और तकरार में घृणा विषाक्त  फैलती,

खोल ग्रंथि बैर की  प्रेम की ही बात आनी चाहिए।।

 

शिष्टता आचार की अब संस्कृति ओझल हुई

सुसंस्कृत विचार की फिर लहर संभ्रात आनी चाहिए।।

 

मतभेद हो मनभेद न यह सोचिए दिल में प्रवर,

ज़िंदगी के मध्य में लहर नहिं दुखांत आनी चाहिए।।

 

वेदवाणी संत वचनों को सुने समझें हम प्रखर

भव्यता जी छोड़िए अब सत विश्रांत आनी चाहिए।।

 

 

प्रखर – फर्रूखाबाद

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