#Kavita by Dr Prakhar Dixit

भजन

 

मोहना

 

कंगना ले आयी बाजना

मैं दौडी चली आयी मोहना

 

मैं वृन्दावन की हौं गुजरिया

नेक बंसुरी सुनाय रे! सांवरिया।

तू रसराज छबोलो बांको,

मैं दौडी चली आयी……

 

सावन घन छाए नैनन मँह

मेरी नींद गयी जाने चैन कँह

कजरारे कपोल उदास पैंजनी,

लागै सखि सुनो आंगना।।

मैं दौडी चली आयी………

 

पनघट जमुना तट सुन परे

रसराज बिना रस कौन भरे

छछिया भर छाछ जो मांगै सखी,

अब सूने खरिक घट री दोहना।।

मैं दौडी चली आयी …………..

 

सिर मोर मुकट गल पीताम्बर

तुम पै वारी मैं मुरलीधर

रे! तू छलिया चितवन टेढी,

मतवारी रास रचाऊँ सोहना।।

मैं दौडी चली आयी …………..

 

प्रखर दीक्षित

फर्रूखाबाद

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.