#Kavita by Dr Prakhar Dixit

तिरंगा बना जब कफन देशहित

 

सीमा रक्षित रहीं ये उन्हीं से सदा,जो-

बलिदान का शुचि हवन बन गए।

घोष जयहिंद का मीत चूमे गगन,

अरि को जांबाज विप्लव पवन बन गए।।

 

झरझर निर्झर झरे बल खाऐं सरित।

गूँज कलरव विहग वन लुभाऐं हरित।।

चूमते नभ शिखर हिम की चादर बिछी,

ग्लेशियर के पथिक पथ कठिन बन गए।।

सीमा रक्षित रहीं ये उन्हीं से सदा,जो-

बलिदान का शुचि हवन बन गए।

 

यह जीवन कठिन याद संबल बने।

जिँदगी  से मुकाबिल कजा से ठने।।

न जाने कहाँ शाम ढल जाए ये,

शौर्य के जीत के वन सघन बन गए।।

सीमा रक्षित रहीं ये उन्हीं से सदा,जो-

बलिदान का शुचि हवन बन गए।।

 

ऐ प्रिया तुम हमारा हो जीवन प्रखर।

सहेजो परिजन; कहीं नहिं जाऐं बिखर।।

तिरंगा बना जब कफन देशहित,अश्रु आँखों के श्रृद्धासुमन बन गए।।

सीमा रक्षित रहीं ये उन्हीं से सदा,जो-

बलिदान का शुचि हवन बन गए।।

 

डॉ प्रखर दीक्षित – फर्रूखाबाद

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