#Kavita by Dr Prakhar Dixit

*ख़ुशी ****

तुम्हें देखा झरोखे में सच ख़ुशी मिल गयी।
शक की सुई मितवा खुद ब खुद हिल गयी।।

हाय जुल्फें वो सकुचा कर शरमा जाना
आँखों में तैरती सुरमाई देख बांछें खिल गयी।।

तुम्हारा रूठना मनाना हया में सिंदूर हो जाना
मुहब्बत में फना हुए मानो कजा मिल गयी।।

तन्हाई में तुम्हारे ख्वाब आए हैं बेहताशा
दीदार ए हुश्न हुआ तो जुबान सिल गयी। ।

ये लरजते होंठ औ’ चौदहवीं के चाँद सा चेहरा
प्रखर ज़िंदगी को बिन मांगी मुराद मिल गयी।।

प्रखर दीक्षित
फर्रुखाबाद

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