#Kavita by Dr Prakhar Dixit

रामनाम

राम भरोसे रह मना, जग मिथ्या व्योहार।
राम तरणि भवसिंधु की,राम जगत आधार।।

राम हिये मँह राखिए, राम आस विश्वास।
राम गए माटी प्रखर, भजै राम प्रति श्वास ।।

दाम राम सै जोड़ मन, नियरे नहीं संताप।
वही जोडता तोडता, कबहुँ म करिए पाप।।

रैनबसेरा जगत यह , चौरासी का फेर।
जाना जगृसे एकला, प्रखर ब्रह्म टेर।।

प्रखर
फर्रुखाबाद

One thought on “#Kavita by Dr Prakhar Dixit

  • November 10, 2018 at 6:15 am
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    उम्दा सृजन…जय हो!

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