#Kavita by Dr prakhar Dixit

जय जगदम्बे शारदा

गिरा स्वरा जगदम्बिका , शारद वत्सल माय।
करहु प्रखर प्रज्ञा विमल, होवहु बेगि सहाय।

शुभ्र बसन कमलासनी , राजत पुस्तक माल ।
कलानिधे! करिओ अभय,दमकत अरुणिम भाल।।

उमा रमा ब्रह्माणि तुम , वत्सल भव पतवार।
रखिओ आंचर छाँव माँ, देवहु शुद्ध विचार।।

अपढ मूढ असहाय हौं, बाढै ज्ञान प्रशाल।
हे वीणपाणि सुधि लीजिओ , वाहन शुभ्र मराल।।

शुभदा सुखदा सौख्यदा ममता मूरत माय।
आवागमन के फंद कटैं, ज्योति मँह जोत समाय ।।

वर्ण अर्थ विस्तारिका ,तुमहि शब्दिता मात।
पाप ताप संताप हन, देहु जीवनीय श्रांत ।।

प्रखर लेखनी दृढ रहे, करों सृजन शुचि मात ।
बिना कृपा जग सून यहु, तुम बिन कहाँ बसात*।।

*बसात= वश से परे

प्रखर दीक्षित
फर्रुखाबाद

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