#Kavita by Dr Prakhar Dixit

नवगीत

(छंदमुक्त)

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किन्तु न सहमति……..

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व्यर्थ नगाडे बजे  दुंदुभी

शिखर पुरुष का जोश तुम्हें।

बहुत लुट गया होगा तब तक

जब आएगा होश तुम्हें।।

 

तुमने वस्तु बनाया,परखा-

अतिचारों की व्याख्याऐं

रीत,रूढियाँ ,प्रतिबंधों की

कसमें शोषण दुविधाऐं

रूह नहीं–

बस लाश हूँ ज़िंदा

सहन नहीं परितोष तुम्हें।।

बहुत लुट गया होगा…………

 

यूँ तो कहते सहचरी सर्जना

आगत का कुंभज मैं ही

किन्तु न सहमति

इक छदाम की

क्या प्रभुवर है–

यही व्यञ्जना

रौंदी गयी बिछावन बनती

किन्तु न कृपालु हुआ मनस

सर्वस्व समर्पण कर डाला–

पर ,आया न संतोष तुम्हें।।

बहुत लुट गया होगा…………

 

हे!सिंह राशि के पौरुष

सुन लो–

अब अबला नहीं सबल नारी

यदि अपनी पर बन आए तो-

छा जाती निशि अंधियारी

तुम्हें बदलना होगा

समझो–

प्रकृति पुरुष एकात्म करो

पुन: आर्ष की

रीति वैदिकी अपनाकर

मिथ्या दम्भ समाप्त करो

शीलहरण जारी वहशीपन लख

क्या प्रखर न आता रोष तुम्हें।।

बहुत लुट गया होगा…………

 

व्यर्थ नगाडे बजे  दुंदुभी

शिखर पुरुष का जोश तुम्हें।

बहुत लुट गया होगा तब तक

जब आएगा होश तुम्हें।।

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रचना= प्रखर दीक्षित

( फर्रूखाबाद)

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