#Kavita by Dr. Prakhar Dixit

(कन्नौजी (शूरसेनी) बोली)

 

कुशलता की पाती

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लिखौं कुशलता की पाते मैं, सुधि आवै अपने गाम की।

जिय चाहवै फिर हुंअनहिं खेलें , रखिहैं लज्जा नाम की।।

 

कैसी अब दद्दा की खांसी ऐनक का बनवाय दयी।

अम्माँ की बे डांट पुरानी आजौं हमकों लें नयी।।

कैसे गढी के बिसेसुर पांडे ,

कछु लिखियो राजीराम की।।

लिखौं कुशलता की पाते में……….

 

कच्चो मढा रामधारी को का चौमासे मँह बच पहै।

सकते चचा की छानी छप्पर ऐसों दद्दा किमि छहै।।

सुख्खू लम्बे धनपत भैया,

हमैं, चिंता उनके काम की।।

लिखौं कुशलता की पाते में……….

 

पक्की भई का रामलली की कौलौं लगुन विचारी जी।

भीखू नातादीन किशुनुआ की अबहुँ का ख्वारी जी।।

हियन करम बस संगी अपुनो,

बाकी इच्छा राम की।।

लिखौं कुशलता की पाते में……….

 

टिन्कू की महतारी रखियो धीरज दु:ख विहान में।

ज्वाला बने नयन के मोती तुम सुंदर छवि मम प्रान में।।

वीरांगिनि है प्रात हमारो ,

नाय खबर ‘बा’शाम की।।

लिखौं कुशलता की पाते में……….

 

कल कल नदियाँ झर झर निर्झर ऊँचे गिरिवर सीमा के।

भोर कठिन शीतल पुरवाई नीके मंजर सीमा के।।

‘प्रखर’ इहाँ अंर्त चिंगारी,

हिय संबल सजनी बाम की।।

लिखौं कुशलता की पाते में……….

 

डॉ प्रखर दीक्षित

फतेहगढ,फर्रूखाबाद(उ.प्र.)

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