#Kavita by Dr Pratibha Prakash

शीतकाल का शीत सुप्रभात

धुंद के आलम में अलाव का आगाज़
चेहरे को चेहरा दिखे न दिखे
पर चिड़ियों ने समय पर दी आवाज
आज पुराने मिटटी के चूल्हे पर
मक्की की रोटी फिर से आई याद
एक रसोई में सब मिल बैठे
सबका भोजन एक ही साथ

ये मेरा गुजरा कल था
गैस की रसोई मेंसब बिखरा सा है
ये अपनापन परिवार का खोया सा है

इकठ्ठे बैठ कभी मूंगफली की लड़ाई
और किसी की करते थे ठंडी रजाई

सब अपने अपने कार्य में व्यस्त है
पर जाने क्यों मौसम ने दिला दी याद

डॉ प्रतिभा प्रकाश

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