#Kavita by Dr. Ramesh Kataria Paras

जो कल नहीँ बदला वो आज़ बदल जाएगा

मौसम के साथ इंसा का मिजाज बदल जाएगा

 

सदियों से मानते आ रहे हम सभी

धीरे धीरे वो पुराना रिवाज़ बदल जाएगा

 

साकी कभी पिलादे आँखो के पैमाने से

मैखाने में पीने का अंदाज़ बदल जाएगा

 

कभी सुर में सुर मिलादे है दिल की यही तम्मना

हम दोनो के जीने का अंदाज़ बदल जाएगा

 

खरगोश अगर चाहे तो एकता में बल है

जंगल में भेडियों को राज़ बदल जाएगा

 

पीटे ना लकीरों को यदि रूढ़ियों को तोड़े

पिछ्डा हुआ ये अपना समाज बदल जाएगा

 

वो एक बार छेड़ दे आकर मेरे तारों को

आवाज़ बदल जाएगी साज बदल जाएगा

 

डा.रमेश काटारिया पारस 9329478477

 

 

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