#Kavita by Dr. Ramesh Kataria Paras

दिवाली है

एक नये छंद के साथ

 

चारो तरफ़ अँधेरा है कहते है लोग दिवाली है

 

महँगाई बढ़ रही देश में लोग यहाँ जी रहे कलेश में दुश्मन मिलते दोस्त के भेष में बंजर सारे खेत पड़े है जख्मों में हरयाली है

 

कहीँ पे बाढे कहीँ पे सूखा देश का हर बच्चा है भूखा लोगों का व्यवहार है रूखा

बच्चो को नहीँ दूध मयस्सर ये कैसी खुशहाली है

 

मयखानों में भीड़ लगी है मन्दिर सूने पड़े हुए है ये मेरा है वो तेरा है सब इसी बात पर अडे हुवे  है

मुझको देश का हर मानव लगता आज़ मवाली है

 

थोड़े से दहेज की खातिर सोफा कुर्सी मेज की खातिर बी पी एल गोदरेज की खातिर

आज़ जला दिया जिन्दा जिसको कल कहते थे घरवाली है

 

बहू ले आकर खुश होते है

लाला ना हो तो रोते है

 

भ्रूण हत्या करवा देते है

अगर गर्भ में लाली है

चारो तरफ़ अँधेरा है कहते है लोग दिवाली है

 

डॉ रमेश कटारिया पारस ग्वालियर

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