#Kavita by Dr. Ramesh Kataria Paras

वो जो दरिया की तरहा से बह रहा है

चलना ही जीवन है वो ये कह रहा है

 

ढल रहा है हरदम सूरज की तरह जो

और धरती की तरह ग़म सह रहा है

 

हर जनम में बेशक इसका रूप और था

हर युग में मौजूद लेकिन वह रहा है

 

ये हमारी रस्में है पाराम्पराए और रिवाज़

खून बन कर जो नसों में बह रहा है

 

सत्य का है बोलबाला झूठ का हरदम मुँह काला

युग कोई भी हो मगर ये तय रहा है

 

क्या करोगे दूर परदेसो में जाकर

प्रेम का दरिया यहाँ पर बह रहा है

 

क्यों ना हम बच्चो को बांटे प्रेम अपना

बडो का हम पर सदा स्नेह रहा है

 

अपने ही अब तो पराए हो गए पारस

विश्वास का पर्वत दरक कर ढह रहा है

 

Dr रमेश कटारिया पारस

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