#Kavita by Dr. Ramesh Kataria Paras

दीपक तले अँधेरा क्यू है

ओझल अभी सवेरा क्यू है

 

क्यों सब नहीँ है साँझा घर में

वो तेरा ये मेरा क्यों है

 

देख के उनका रूप सलोना

चाँद वहीँ पे ठहरा क्यों है

 

क्यों नहीँ सुनता मजलूमों की

ऊपर वाला बहरा क्यों है

 

कुछ भी नहीँ सुझाई देता

कोहरा इतना गहरा क्यों है

 

नाग सभी दिल्ली में बैठे

फिर ग़मगीन सपेरा क्यों है

 

जाल अभी फेंका है जल में

उदासीन ये मछेरा क्यों है

 

राजनीति की इस बिसात पर

हर इंसा इक मोहरा क्यों है

 

मंज़िल पर जब मैं पहुँचा तो

उतरा सब का चेहरा क्यों है

 

पारस जी

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