#Kavita by Dr. Ramesh Kataria Paras

अब किसी के पास सच्चा दिल नहीँ है आजकल

हर चीज़ पॉलीथीन में मिल रही है आजकल

 

छाप तिलक खुसरो की छिन गई थी उन दिनो

कबीर की झीनी चदरिया मीरा सिल रही है आजकल

 

किस पर करे भरोसा किसी का यकीं नहीँ

नींव आस्थाओं की हिल रही है आजकल

 

अब नहीँ आसान जीवन की डगर ए दोस्तो

मुश्किल से दो जून रोटी मिल रही है आजकल

 

अब नए कानून है अब है सारे नए नियम

बर्फ पराम्पराओ की गल रही है आजकल

 

वो जो उड़ते फ़िर रहे थे कल तलक आकाश में

पाँव के नीचे ज़मी हिल रही है आजकल

 

डा.रमेश कटारिया पारस

 

57 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Whatspp dwara kavita bhejne ke liye yahan click karein.