#Kavita by Dr. Ramesh Kataria Paras

जिनके हिस्से ग़म हुए ऐसे केवल हम हुए

चाँदनी आई उनके हिस्से अपना मुकद्दर तम हुए

 

राजनीति की गन्दी चाले जुल्फो के पेंचों खम हुए

विषम रहे वो हरदम हमसे हम ही हमेशा सम हुए

 

दिल रोता है खून के आँसू कैसे कैसे करम  हुए

 

बेइज्जती करवा कर खुश है ऐसी भी बेशर्म हुए

 

हरदम घाटा दिखलाते है सरकारी इक फर्म हुए

इक दूजे को लड़वा देगे जैसे कोई धर्म हुए

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