#Kavita by Dr Sarla Singh

रिश्ते

राह पर चलते -चलते,

राहें बदल गई ।

रिश्तों को संभालते ही रहे,

रिश्ते बदल गये ।

जीत की इक आस  में ,

हम हारते ही रहे  ।

वक्त ने करवट बदल ली,

हम देखते ही रहे ।

जज्बात के मारे हुये,

सम्मान की इक आश भी ।

ठोकर ही मिला मुझको सदा,

लोग छूटते ही गये ।

राह में चलते -चलते ।

कुछ यादें ही रहीं,

अब शेष बचीं ।

पीछे काफी कुछ छूट गया,

कुछ तीखी, कुछ मीठी सी ।

राह के सहभागी सभी,

साथ छोड़ने लगे ।

हम अकेले ही  रहे,

जब भी पड़ी मुझको जरुरत ।

उनकी जरुरत में सदा,

हम खुद को लुटाते ही रहे ।

राह में चलते -चलते ,

राहें बदल गयीं।

 

डॉ. सरला सिंह ।

 

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