#Kavita by Dr. Sarla Singh

एक छोटी सी बच्ची ।

 

रेल खड़ी होते ही ,

भागती इधर से उधर ।

थामे हुए अपने ही कद का,

एक बोरा पैबन्द वाला ।

भर रही उसमें वो भोली,

फेंके हुए खाली पड़े

बोतल पानी के।

रेल की पटरियों पर दौड़ती ,

पा सके ताकि अधिकतम  ।

खुद से बड़े बोरे के कारण ,

बार कई वो गिरती ,

लड़खड़ाती गिरती उठती ।

छोड़ती  फिर भी ना ,

आस अपनी वो  बच्ची ।

दौड़ पड़ती फिर से ,

किसी खाली पड़े बोतल के लिए ।

ऐसे ना जाने इस दुनिया में,

कितने बच्चे लड़ रहे हैं ,

अपने जीवन का संघर्ष यूँ ही ।

क्या हमें कुछ भी  ,

नजर नहीं आता है या फिर,

ना देखने का ढोंग करते फिर रहे ।

क्यों बनावट की दुनिया में ,

सब यहाँ उलझे  पड़े हैं ।

प्रथम कर्तव्य तो हमारा ,

उनके लिए ही,

समर्पित होना  चाहिए ।

हर बच्चा समाज में ,

एक बराबर होना चाहिए ।

समाज के भावी ,

कर्णधारों के प्रति हमारा ,

एक पुख्ता उद्देश्य होना चाहिए।

हर एक बच्चे का समाज के,

भविष्य सुनिश्चित करें ।

 

डॉ.सरला सिंह

 

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