#Kavita By Dr Sarla Singh

शहीदों को नमन!
मात्र सैंतीस सैनिक ही नहीं थे वे,
भारत के सैंतीस चिराग थे वे वीर।
सैंतीस माता-पिता के आंखों के नूर,
सुहाग किसी का, किसी के भाई थे ।
देश के लाल चले गए जो पलभर में,
पिता किसी के थे वो मेरे वीर जवान।
क्या मिलाउन वीरों की जिंदगी लेकर,
ग़़र हस्ती है तुझमें जिंदगी देकर देखो।
लूट लिया पल भर में किसी का घर ,
किसी का पति पिता बेटा और भाई ।
मिला कैसा सुकून बताना ये भी जरा,
देते तो दुखियों को तुम खुशियां देते ।
रोती, कलपती, पछाड़ खाती है मां ,
हाय मेरे लाल की ऐसी गति ना होती ।
बिलखती पत्नी पलभर में ये पतझड़ ,
सुबकते बच्चे खोजते आज पिता को।
इस हिंसा से वे क्योंकर पाते हैं सुकून,
उनको ईश्वर का भी तो डर नहीं लगता।
फिर तो राक्षस हैं वे और उनका फिर ,
पूरी तरह से अरिमर्दन ही करना होगा।

डॉ सरला सिंह ।
दिल्ली

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