#Kavita by Dr. Sarla Singh

बात

कहें क्या बात हम अपनी,

हमारी बात ही क्या है ।

जमाने के सताऐ हैँ,

जमाने की कहें क्या हम?

बात ही बात में जज्बातों की

कुछ बात  कहते हैं ,

जमाना है किसी का ना ।

सभी स्वार्थ के हैं साथी हैं ,

बेबात कोई  भी न मिला ।

दोस्त तो ना मिला कोई,

दुश्मन ही सरे राह मिले ।

गैर तो गैर ही थे,

अपने भी पराये  निकले ।

बात जब चल ही गई ,

बातों ही बातों  में ।

बिना बात बातों का ,

बतंगड़ न बना दे कोई  ।

बात में दम इतना,

कि बेदम कर दे ।

तीर तलवारों को हरा दे,

गोली बारुद से भी

तेज है  बातों का असर ।

घाव तो ठीक हो ,

गोली व बारुद का भी ।

बातों से लगा घाव,

कभी न भर पाये ।

बात बनाने की ,

हमें आदत ही नही।

बात ही बात मे ,

बात बनती ही गई ।

बात संभल कर ,

जरा अपनी रखिए ।

बात बिगड़ जाए ,

तो फिर क्या कहिये ।

कहें क्या बात हम अपनी,

हमारी बात ही क्या है ।

 

डॉ.सरला सिंह ।

 

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