#Kavita by Dr. Sulaxna Ahalawat

शिकवा गिला, बुरा मानने वाला दौर नहीं रहा,

समाज सेवा के अलावा मकसद और नहीं रहा।

 

कुछ सोचते रहें लोग, मुझे अब परवाह नहीं रही,

मन में है संतुष्टि, अब पहले जैसा शोर नहीं रहा।

 

कलम चलाकर जागरूक करनी है आम जनता,

रचनाओं में अब श्रृंगार और चित्तचोर नहीं रहा।

 

सामाजिक समस्याओं को उठाती हूँ रचनाओं में,

असहायों और गरीबों के दुखों का छोर नहीं रहा।

 

मिलती है खुशी मन को, दूसरों की मदद करके,

रम गया ये समाजसेवा में, मन पर जोर नहीं रहा।

 

निकल पड़ी है अब सुलक्षणा खुशियाँ बाँटने को,

देख मुस्कान चेहरों पर खुशी का ठौर नहीं रहा।

 

डॉ सुलक्षणा

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