#Kavita by Dr. Sulaxna Ahlawat

इन पाखंडी गुरुआं के धोरै कोय ना जाइयो,

देवी देवता घर म्ह बसें आंख खोल लखाइयो।

 

खुद नै भगवान बतावैं सँ ये, जाणै ना मर्म नै,

तोड़ मरोड़ के बात करें, गलत बतावैं धर्म नै,

साँस तलक ना आवै देख कै इनके कुकर्म नै,

चौड़े के म्ह बेच कै खाज्यां सँ ये लाज शर्म नै,

इसे ढोंगी पाखंडियाँ तै थम खुद नै बचाइयो।

 

घर गृहस्थी बसा कै बी खुद नै साधु कहे जां,

निनानवै के फेर म्ह ये पाखंडी हरदम रहे जां,

जिस बल की हवा बहवै, ये उसे बल बहे जां,

पर आँख मींचे मूर्ख दिन रात पायां म्ह ढहे जां,

सत कसौटी पर कस कै थम धर्मगुरु बनाइयो।

 

लोभ, मोह, काम, क्रोध सबका त्याग करै साधु,

इस ठगनी धन माया कै पाछै कदे ना फरै साधु,

धरती प सोवै और घर घर मांग कै पेट भरै साधु,

आठों पहर उस ईश्वर के भजन म्ह नीत धरै साधु,

इन ढ़ोंगी पाखंडियाँ के चक्करां म्ह मत ना आइयो।

 

मात पिता, सास ससुर की सेवा कर पार उतर ल्यो,

कह गुरु रणबीर सिंह रोज हर का नाम सुमर ल्यो,

बेसहारां की मदद करकै खुश उस ईश्वर नै कर ल्यो,

सब भली करेंगे ईश्वर संतोष सब्र नै चित म्ह धर ल्यो,

मान सुलक्षणा की पाखंडियाँ का सच स्याहमी ल्याइयो।

 

 डॉ सुलक्षणा

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