#Kavita by Dr. Sulaxna Ahlawat

बारणै आगै खड़ी गऊ नै ताहवैं,

ये माँ बाप नै घर तै काढ़ बगावैं,

देखियो र किसै चालै होगै आज।

 

बुआ, बाहण बोझ लागण लागी,

माँ बी देखे दिखण डाकण लागी,

देखियो र किसै चालै होगै आज।

 

लुगाईयाँ की सीख तै भाई गैर होगे,

दो गज ज़मीन की बाबत फैर होगे,

देखियो र किसै चालै होगै आज।

 

आपणै फैदे खातर यारी करण लागै,

बहु, बाहण प लोग नीत धरण लागै,

देखियो र किसै चालै होगै आज।

 

भाईचारे की किसै नै चान्हा ना रही,

या पंचायत बी साच कान्हा ना रही,

देखियो र किसै चालै होगै आज।

 

भीड़ पड़ी म्ह खुश होवैं यारे प्यारे,

दूर तै हाथ हला दें रिश्तेदार सारे,

देखियो र किसै चालै होगै आज।

 

सुलक्षणा” साच के हिमाती ना रहे,

दुःख म्ह काम आवनिये साथी ना रहे,

देखियो र किसै चालै होगै आज।

 

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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