#Kavita by Dr Sulaxna Ahlawat

मरवाना त मैं भी ना चाहता बेटी प्यारी नै,

क्यूकर के संभालूँगा मैं इस केशर क्यारी नै।

 

आज घर घर म्ह रावण पैदा आज होरे सँ,

सब जानैं जो सीताहरण का ओड्डा टोहरे सँ,

ना कोय जटायु दिख्दा जो रोकै रावण उड़ारी नै।

 

आज कलजुग में घर गेल्याँ दुशासन पावैं सँ,

जो द्रोपदी का रोज चीरहरण करना चाहवैं सँ,

चीर बढ़ता कोणी हारी पुकार उस कृष्ण मुरारी नै।

 

किस किस के जुल्म तै मैं इसने बचाऊंगा,

देख दुखी इसनै एक पल बी जी ना पाऊंगा,

दुनिया के रंगढंग माड़े न्यू मरवाऊँ सुं इस बेचारी नै।

 

चौगरदे के लखा ले “सुलक्षणा” आ रहा बख्त माड़ा,

ना इसा जगत म्ह जो अगत बेल प चलावै कुल्हाड़ा,

आछै बुरे का ख्याल रहा ना, हड़ी बुद्धि हवस बीमारी नै।

 

डॉ सुलक्षणा

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