#Kavita by Dr Sulaxna Ahlawat

के बुझौगे भाई किसा यू म्हारा हरियाणा स,
सीधे साधे लोग आड़े के अर सादा बाणा स।

मुँह अंधेरे उठ कै पहल्यां डांगर ढोर सँभालैं,
बीरबानी गोबर पानी करकै फेर चूल्हा बालैं,
गाबरु छोरै दौड़ मारैं, कसरत कर देहि घालैं,
म्हारै र दुनिया भर म्ह भई रोज जिक्रे चालैं,
के पिज्जा के बर्गर, दूध दही का खाणा स।

मुफ्त म्ह किमैं चाहिये ना, करकै खावां साँ,
आंधी टलै ना मींह टलै हाम खेत कमावां साँ,
रल मिल कै रहवां हाम भाईचारा सिखावां साँ,
छोटी बड़ी सारी बातां नै हाम आपै सुलझावां साँ,
म्हारी पंचायत आपै कोर्ट कचहरी अर थाणा स।

बोर्डर ऊपर डटै रहवां, मरण तै ना घबराते,
खेलां म्ह बी मैडल प मैडल जीत कै ल्याते,
बाहण बेटी की इज्जत करण म्ह आगै पाते,
साची बात मुँह प कह दयाँ कति नहीं शर्माते,
म्हारै ऊपर किसै का चालै नहीं धींगताणा स।

होक्के अर ताशां के शौकीन ये बड़े बूढ़े सारे,
दुनिया जानै स कुश्ती अर कबड्डी खेल म्हारै,
रागनियां का चस्का, ये घड़वा बैंजु लागैं प्यारे,
दादा जगन्नाथ की बात गुरु रणबीर सिंह गा रे,
बड़वासनी म्ह जा सुलक्षणा नै सिख्या गाणा स।

डॉ सुलक्षणा

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