#Kavita by Dr Sushil Rakesh

—–कविता
मदर्स डे पर मां की बरबस याद आती है
बचपन से ही उनकी नजरों ने
मुझे कामयाब बनाया
बचपन में पाठशाला में जाने के लिए
कपड़े पहनाती /बाल काढ़ती
और पट्टी को रगड़-रगड़ चमकाती
बुरका में रौशनाई भरती
सरकंडे की कमल बनाती
एक झोले हिन्दी वर्णमाला की पुस्तक घर
कंधें पर लटका देती
मैं निकल पड़ता पाठशाला की ओर
जब लौटता तो
थका हारा खूब दुलार करती मां
दूध और चबैने को खाने को देती
शाम खेलता सखा संगाती के साथ
अपने नजरों से दूर नहीं जाने देती
रात्रि बाजरे की रोटी और आलू के भरते में
उनका प्यार उमड़ता
फिर सो जाता उनकी कथा कहानी में
आज मैं जिस सफ़र पर हूँ
उनकी मेहनत का ही फल है
मां नहीं देखती बेटा उनका किस
मुकाम पर है
पर मैं जो कुछ भी हूं
उनके चरणों का प्रताप है
बस माँ तुमको कोटिशः नमन।

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