#Kavita By Dr Yashmeen Khan

विश्व कविता दिवस और होली की बधाई

कविता’

जब दिल का दर्द झलक आया,
नैनों से तरस, बरस नगीने से
जब भूखा बचपन हो उठा द्रवित
तब हूक के भाव हो उठे मुखरित,
जब भी देखा दृश्य कोई निरीह,
जब शोषण चरम को छूता हुआ मिला
मस्तिष्क से फूटे शब्द अंगार
जला डालने को आतुर दुष्ट व्यवहार,
जब भर उठा ज़ेहन
कोमल स्फुटन,स्पंदन, मीठी चुभन
सुखद आनन्दित अनुभवों से,
जब भी पीड़ा असहनीय हुई,
भावनाएँ मचल उठी ,बिन जल मछली सी
तन ,मन के भीतर खुजली सी,
जब दिखने लगा मुख कोई हरपल पास
जब-जब भी जीने की जगी है आस
जब ख़ुद ही ख़ुद को लगने लगा ख़ास,
जो भी मन में आया वो उगल दिया
आड़ी, तिरछी रेखाओं से
कागज़ पर विचार स्याही से
जीवन छबि बन बैठी फिर अनोखी ,न्यारी
सन्तुष्ट होकर नव उजली सी
लोगों ने पढ़कर कहा आह! ,वाह
खूब कविता अवतरित हुई।
डॉ. यासमीन ख़ान

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