#Kavita by Dr. Yasmeen Khan

क़लम पर सिहर उठे सवाल’

 

पीर- ए मुगां ख़ुद को समझने की

लड़खड़ाती तहरीर कहो

लफ़्ज़ों में छुपी बेवजह नफ़रत की

शमशीर कहो,

 

उलझने बढ़ाने को बेताब तेरी निष्ठुरता,

ख़ुद की नज़र में तू है बड़ा ही सुर्ख़रु शहंशाह

अपने  प्रेम की पीर कहो ,

रूहानी रिश्ते का भी उड़ाना

तेरा मज़ाक

करना जज़्बों के महल को पल

में ही राख़,

लूटी गई  किसी लुटेरे के हाथ

मासूम हीर कहो,

 

महज़ किसी की ख़ुशी की ख़ातिर ख़ुद

से कराया जिसने करने दिया

किल्लोल,

तेरे समर्पण में जाने क्यों

आया था झोल,

उसके  लफ़्ज़ों  का अक़्स  अब  भी

तेरी क़लम की नोंक पर भीगा हुआ सा

तेरी सूखी पथरायी आँखों के जुगनुओं में चमकता सा उसी का क्यों नूर ?

तेज़ मादक गंध जब नहीं तुझे सुहाती

वो ही गन्ध क्यों तेरे वजूद से है फिर आती ?

 

उदासी में भी ज़ेहन में एक चेहरा बेलौस खिला हुआ है,

माना की जागीर में तेरी उलझनों का भंडार ही बस मिला हुआ है।

तहरीर ही फ़क़त है मस्त की बड़ी

जागीर कहो,

अपने ही तकब्बुर – ओ तैश की बनाई किस्मती लकीर कहो,

हारे हुए लाचार, खुदगर्ज़  लफ़्ज़ो के शहंशाह की तामीर कहो,

अय्यारी,मक्कारी लबरेज़ इश्क़-ए जाम ,बनाम

ज़ंजीर कहो,

गद्दारी लहू के क़तरो की परम्परा या

तासीर कहो,

कुछ  सवाल  जो  ज़ेहन और लब , क़लम पर आकर सिहर जाते हैं ।

डॉ.यासमीन ख़ान

389 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *