#Kavita by Durgadas Pathak , Anurag

शर्म (लज्जा)

 

घाटी घायल है तो केवल,

आस्तीन के साँपों से।

 

नमक हराम, बेमुराद,

दोगली संतानों से।

 

अब तो शर्म करो तुम,

ऐ कैसी नादानी हैं।

 

भूल रहे हो तुम,

 

प्रलय पड़ा जब जब घाटी पर

 

आगे आकर हाथ बढ़ाये,

 

ऐ बही सैनिक हिंदुस्तानी हैं।

 

पत्थर उठाते लाज न आई,

 

यही कश्मीरियत की निशानी हैं।

 

अब तो शर्म करो तुम,

ऐ कैसी नादानी हैं।

 

स्वर्ग की धरती छलनी करदी,

 

ये देश के साथ बेईमानी है।

 

अब तो शर्म करो तुम,

ऐ कैसी नादानी हैं।

 

#प.दुर्गादास पाठक”अनुराग”

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