#Kavita by Er Anand Sagar Pandey

*वाहिकाओं में लहू बनकर प्रवाहित*

 

 

छंँट चुका सारा अंधेरा अब दिवस है,

मन का हर संताप मिटने को विवश है,

अब अलोैकिक शान्ति मन को भा रही है,

सृष्टि हर इक सार स्वयं समझा रही है,

दृष्टि अब जाती जिधर है तुम ही तुम हो,

बंधनों के पार आकर मुझमें गुम हो,

ओढ ये परिकल्पनाएँ सो चुका हूँ,

मैं तुम्हारे प्रेम में यों खो चुका हूँ ॥

 

 

आयु का भीषण हलाहल पी रहा हूँ,

मरते-मरते यों मरा कि जी रहा हूँ,

काल बनकर पीर को अब डँस रहा हूँ,

रो रही है वेदना मैं हंँस रहा हूँ,

अब तमस की वेदिका पर झूलता हूँ,

याद करके तुमको खु़द को भूलता हूँ,

अब मैं जितना था, तुम्हारा हो चुका हूँ,

मैं तुम्हारे प्रेम में यों खो चुका हूँ ॥

 

 

अब ना कोई चाह ना आशा है कोई,

शब्द हैं सब माैन ना भाषा है कोई,

अब प्रणय की चाह का रोना नहीं है,

बोझ दृग को स्वप्न का ढोना नहीं है,

अब मिलन ऐसा है कि विरहा नहीं है,

जग के ओछे रूप का साया नहीं है,

आँसुओं से धूल मन की धो चुका हूँ,

मैं तुम्हारे प्रेम में यों खो चुका हूँ ॥

 

 

प्रात की नव धूप में खिलती हुई सी,

पल्लवित नव पुष्प से मिलती हुई सी,

तुम सुगन्धित वायु बनकर बह रही हो,

मेरी श्वासों से लिपटकर रह रही हो,

दृष्टि के हर दृश्य में तुम हो समाहित,

वाहिकाओं में लहू बनकर प्रवाहित,

प्रेम के नव अर्थ मन में बो चुका हूँ,

मैं तुम्हारे प्रेम में यों खो चुका हूँ ॥

 

-अनन्य देवरिया

 

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