#Kavita by Garima Singh

हर छल प्रपंच से दूर रहूँ तुम इतनी भक्ती देना माँ

निर्मल गंगा सी नीर बनूं तुम इतनी शक्ती देना माँ..

वो सत्य भरा मैं तेज बनूं जब झूठ दिखे अंगार बनूं

हो ज्ञान ही जिसमे झंकृत उस वीना सी झंकार बनूं

जो मांगू उसका निर्वाह करूं तुम इतनी शक्ती देना माँ

मर्यादा की परवाह करूं तुम इतनी शक्ती देना माँ ..

 

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बच्चे अब ना घर  सुरक्षित

और ना ही  बाहर  सुरक्षित

अनजाना या जाना पहचाना

नहीं कोई नजर  सुरक्षित..

बच्चे भी आहार बने हैं .. है

चाह!रहे जानवर सुरक्षित..

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मैं नदिया की धार नहीं पर सींचती हूँ तुम्हारे  घर का हरेक रिश्ता

मैं औरत हूँ …  थोड़ा मुश्किल तो है मुझे समझना …!

पर क्या हुवा जो तुम मुझे समझ नहीं पाते … आश्वस्त हो !

मुझे बाखूबी आता है सब कुछ संभालना ……!!

मैं औरत हूँ……. थोड़ा मुश्किल तो है मुझे समझना  !

बेशक तुम्हारी दुनिया मुझसे शुरू और मुझी पर खतम  है..पर

मुश्किल है  माँ, बहन और पत्नी इतने रूपों को समझना!

मैं औरत हूँ थोड़ा मुश्किल तो है मुझे समझना …

 

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