#Kavita by Garima Singh

या मैं तेरी राह बदल दूँ या तू मेरा रुख बदले

छोड़ मुझे या साथ मेरे हो, मैं बदलूं या तू बदले

हुई किरकिरी आँखों मे कुछ कैसे और न जाने कब

तिनके संग कुछ दिखे नहीं  कैसे नजर कहूं बदले।

अड़चन तो आते ही हैं है राह भला आसान कौन सी

क्युं दिल हरदम ही रोड़े छांटे, राह नहीं दिल क्युं बदले।

कौन हुवा है फ़ना किसी की खातिर भला है कौन रुका

तू अपनी और मैं अपनी बस मंजिल अपनी यूँ बदले।

गरिमा सिंह

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