#Kavita by Garima Singh

जो खाते रिश्वत वही कोसते सरकार,

कोसते सरकार कि खुद का पाप दिखे ना,

रिश्वत खाने का उनका अधिकार मिटे ना।

अध्यापक या डॉक्टर या हो पुलीस में कोई,

हो कोई ब्यापारी या घर का मुखिया कोई,

सभी बने हैं यहां पाप के भागीदारी,

नहीं समझता कोई अपनी जिम्मेदारी।

शिक्षा और चिकित्सा है ब्यापार यहां,

और ब्यापार बना है अत्याचार यहां।

और तो और छोड़ा न ऊपर वाले को भी,

ब्यापार बना के दाव लगाया उसको भी।।।।

ढूंढ़ रहा हर कोई अपना ही फायदा,

फैले चाहे कितना भी फिर रायता।

देश क्या केवल नेताओं की ही है जिम्मेदारी,

क्या नहीं हमारी बनती है कोई भागीदारी?

बिना हमारे कदम बढ़ाये कहां भला कुछ बदलेगा,

जब तक नहीं सुधारे खुद को देश भला क्या सुधरेगा।

 

गरिमा सिंह

 

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