#Kavita by Garima Singh

पक्की सड़कों से निकली तंग गलियां और उन गलियों में कई गलियां,
कि जहां भटकते रहो कोई मंजिल कोई सफर का फासला न हो जहां
तू हमराह तू मीत सा लगता है।
बनारस मुझको तू गीत सा लगता है।
सतरंगी सा तेरा ताना बाना कहीं मंदिरों में घंटियां कहीं खुदा की बन्दगी,
तेरी सांसों से बना हरेक जर्रा कि मौत भी यहीं है और यहीं है ज़िन्दगी।
उम्र भर निभाऊं जो रीत सा लगता है।
बनारस मुझको तू गीत सा लगता है।
भटकता वक्त भी कभी रुकता है तेरे घाटों पर जब कोई सांस थमती है
तेरी ज़िन्दगी की रंगीन साड़ियों सी अदायें जब मौत पर बरसती हैं,
केवल बस तू ही प्रीत सा लगता है।
बनारस मुझको तू गीत सा लगता है।
जब कलम तुझको ही लिखना चाहती है बस तेरी ही स्याही तेरे बोल
कि हो जाता है तब उसके शब्द का हरेक हर्फ़ मुक़द्दस और अनमोल ,
मुझको तब सुरमई गीत सा लगता है।
बनारस मुझको तू गीत सा लगता है।
निर्बाध हवा की आत्माएं टकराती हैं जब तेरे घाट के पत्थरों से,
कि वो युगों से आवाज बन घुल जाती हैं गंगा की पावन लहरों से
मुझको मद्धम संगीत सा लगता है।
बनारस मुझको तू गीत सा लगता है।
कि जब तेरी गलियों में गालियां उनमे खनकती चूड़ियां सजती है बनारस
कि सुरों में सज के एक राग बन के तब दर्द भी खनकने लगती है बनारस
मुझको ये सब ही संगीत सा लगता है।
बनारस मुझको तू गीत सा लगता है।। #बनारस
“गरिमा सिंह”

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