#Kavita by Garima Singh

हिंदी दिवस पर मेरी कविता
बर्तन जो घिस जाता है कभी माजने से,
कबाड़ का हिस्सा बन जाता है,
जिसको बेच देतें है सब ही,
पर खरीदता कोई नहीं।
हिन्दी! तू बिल्कुल वैसी है।
सिँहासन जब कोई पुराना राजशाही,
किसी संग्रहालय में सजता है,
तमाशबीनों के लिये,
मगर उसपर बैठता कोई नहीं।
हिन्दी! तू बिल्कुल वैसी है।
महाभारत के वो मूर्धन्य ज्ञानी विदुर,
सर्वश्रेष्ठ सलाहकार,
धर्मराज के अवतार,
किन्तु सुनता उनको कोई नहीं,
हिन्दी! तू बिल्कुल वैसी है।
सोलह श्रृंगार और सुहाग का बनी प्रतीक,
वो चूड़ियों के टुकड़े,
जिनसे खेलते हैं बच्चे,
पर पहनता उनको कोई नहीं।
हिन्दी! तू बिल्कुल वैसी है।
सुन्दर गुणी संस्कारों से भरी दहेज भी लाई,
हो खूब पढ़ी लिखी,
ताड़ता है जिसे हर कोई,
पर समझता कोई नहीं।
हिन्दी! तू बिल्कुल वैसी है।

गरिमा सिंह

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