#Kavita by Garima Singh

ज़िन्दगी मजबूर सी थकाती मजदूर सी,
शरारतों में तेरी है मिलता आराम सा।

ज़िन्दगी अकेली कोई दूर की सहेली,
पास मेरे तू मेरा कुछ मेरे ही नाम सा।।

ज़िन्दगी तंग सी थोड़ी बेरंग सी,
तू रंगीन इंद्रधनुषी आसमान सा।

ज़िन्दगी दबे हुवे ख्वाबों के ढेर सी,
तू दिल में हर रोज जगते अरमान सा।।

ज़िन्दगी धूप सी बहरूपिये के रूप सी,
तू छांव सा तेरा होना मेरे गांव सा।

ज़िन्दगी मझधार सी नदी के पार सी,
तू लहरों को चीरता मांझी के नाव सा।।

ज़िन्दगी पीड़ सी आंखों में नीर सी,
तेरा मुस्कुराना खुशियों के आहट सा।

ज़िन्दगी शोर सी सांसों के बोझ सी
तू राहत सा तेरा चेहरा चाहत सा।।

गरिमा सिंह

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