#Kavita by Garima Singh

ख्वाबों के चीथड़े,समेटती हूं, जोड़ती हूं,
उम्मीदों का धागा बना ये टुकड़े सिलती हूं
और इस तरह ज्यों ही कुछ जुड़ने को हो
हर बार है फिर से कुतर देती ज़िन्दगी।
सोचती हूं कभी जरा थक भी जाऊं
कुछ देर कहीं कोने में पड़ भी जाऊं
धड़कने थमने से पहले पर आराम कहां
सांस भी तो भरने नही देती ज़िन्दगी।
बनती है हर दिन की दिहाड़ी भी मेरे हिस्से
मजदूर तो बनाई ही है पर मजदूरी भी समझे
कुछ कर्मा जैसा कहीं पढ़ा था मैंने, मगर
किया मेरा ख़ैरात है कर देती ज़िन्दगी।
कुछ टुकड़े नुकीले कल के टूटे ख्वाबों के
जोड़ने में उनको वो हांथों में चुभ जाते
वो हर किसी को ही चुभते हैं फिर
उन्हें है कांच सा तेज कर देती ज़िन्दगी।
बिखरे रिश्तों के मोती बार बार चुनती हूं
समेटती हूं हर बार एक धागे में पिरोती हूं
ये रिश्ते ये धागे वो मोतियों के दाने क्यों
मेरे ही हांथो से फिर बिखेर देती है ज़िन्दगी।
हर रंग में इसके मैंने खुद को रंग दिया
जितना भी जिसने जो मांगा वो दिया
सच ही कहा किसी ने ज़िन्दगी है बेवफा
जो जीता है उसी को दग़ा देती है ज़िन्दगी।
गरिमा सिंह

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