#Kavita by Garima Singh

शब्द नहीं मिलते हैं

लफ्ज़ खो जाते हैं

मन के ख़यालात

जाने कहां सो जाते हैं

बस सूनापन रहता है

चारो ही ओर ,मुझको जब भी

मेरी माँ याद आती है !!!

रिश्ते समझ नही आते

उलझे से लगते हैं

साँसे रुकती न चलती

टूटते से लगते हैं

सब रुका रुका सा

उलझा सा लगता है, मुझको जब भी

मेरी माँ याद आती है !!!

मंदिर ,मस्जिद ,चर्च

और गुरुद्वारा

बेईमानी सा लगता है

ये संसार सारा

पत्थर दिल लगने

लगता है भगवान भी ,मुझको जब भी

मेरी माँ याद आती है !!!

छांव छल भरी

धूप चुभती सी

रोशनी से आँखें

पलकें मुंदती सी

सब छलावा सा

लगने लगता है ,मुझको जब भी

मेरी माँ याद आती है !!!

समय चलता नही

दर्द रुकता नही

पलकों की आड़ में

अश्क रुकता नहीं

आँखों के आगे  सब

शून्य नजर आता है ,मुझको जब भी

मेरी माँ याद आती है !!!

 

 

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